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Half master

सच्चे गुरु की पहचान भारतीय संस्कृति बहुत पुरातन है और इसमें गुरु बनाने की परंपरा भी बहुत पुरानी रही है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में एक गुरु अवश्य बनाता है ताकि गुरु उनके जीवन को नई सकारात्मक दिशा दिखा सके। जिस पर चलकर व्यक्ति अपने जीवन को सफल व सुखमय बना सके एवं मोक्ष प्राप्त कर सके। गुरु की महत्ता को बताते हुए परमेश्वर कबीर जी कहते हैं कि कबीर, गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान। गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुराण।। कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरु कीन्ह। तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन। भावार्थ :- कबीर परमेश्वर जी हमें बता रहे हैं कि बिना गुरु के हमें ज्ञान नहीं हो सकता है। गुरु के बिना किया गया नाम जाप, भक्ति व दान- धर्म सभी व्यर्थ है। ■ उपर्युक्त लिखी गई कुछ पंक्तियां एवं दोहों से हमें यह तो समझ में आ गया कि बिना गुरु के ज्ञान एवं मोक्ष संभव नहीं है। वर्तमान में व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि यदि वह गुरु धारण करना चाहे तो वह किसे गुरु बनाए? उसकी सामर्थ्य और शक्ति का मापदंड कैसे निर्धारित किया जाए । वर्तमान में बड़ी संख्या में गुरु विद्यमान हैं और अ...

#krishnajanmashtami

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युगों से, अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लोग कुछ देवताओं को सर्वोच्च मानते हैं और उन्हें विशिष्ट नामों से अभिवादन करते हैं। उस सर्वोच्च को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी माना जाता है। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई जैसे विभिन्न धर्मों के अनुयायी उस सर्वोच्च आत्मा को / उस ईश्वरीय शक्ति को ईश्वर / अल्लाह / रब / खुदा / भगवान कहते हैं, यह मानने के बावजूद कि एक सर्वोच्च शक्ति है जो 'सबका साथ एक' (ईश्वर है) एक)। अब, भक्तों के मन में यह सवाल उठता है: - वह सर्वोच्च देव कौन है? वह कौन है जो सर्वशक्तिमान है? कौन हैं श्री कृष्ण भगवान? आगे बढ़ते हुए, आइए जानें कि सर्वोच्च ईश्वर कौन है? पवित्र श्रीमद भगवद गीता के अनुसार? जिसका केंद्रीय चरित्र भगवान कृष्ण है। कौन हैं श्री कृष्ण भगवान? लोग हमेशा यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि भगवान कृष्ण कौन हैं या भगवान कृष्ण कौन थे, महाभारत, भगवद गीता और भगवद पुराण का सबसे व्यापक रूप से पूजनीय चरित्र भगवान श्री कृष्ण हैं, जो हिंदुओं के प्रमुख पूजनीय देवता हैं, जिन्हें आठवाँ अवतार माना जाता है भगवान विष्णु की। पवित्र भागवद उन्हें कई दृष्टिकोणों म...

Information of geeta

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परमेश्वर की खोज में आत्मा युगों से लगी है। जैसे प्यासे को जल की चाह होती है। जीवात्मा परमात्मा से बिछुड़ने के पश्चात् महा कष्ट झेल रही है। जो सुख पूर्ण ब्रह्म(सतपुरुष) के सतलोक(ऋतधाम) में था, वह सुख यहाँ काल(ब्रह्म) प्रभु के लोक में नहीं है। चाहे कोई करोड़पति है, चाहे पृथ्वीपति(सर्व पृथ्वी का राजा) है, चाहे सुरपति(स्वर्ग का राजा इन्द्र) है, चाहे श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव त्रिलोकपति हैं। क्योंकि जन्म तथा मृत्यु तथा किये कर्म का भोग अवश्य ही प्राप्त होता है (प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5)। इसीलिए पवित्र श्रीमद् भगवद् गीता के ज्ञान दाता प्रभु(काल भगवान) ने अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि अर्जुन सर्व भाव से उस परमेश्वर की शरण में जा। उसकी कृपा से ही तू परम शांति को तथा सतलोक(शाश्वतम् स्थानम्) को प्राप्त होगा। उस परमेश्वर के तत्व ज्ञान व भक्ति मार्ग को मैं(गीता ज्ञान दाता) नहीं जानता। उस तत्व ज्ञान को तत्वदर्शी संतों के पास जा कर उनको दण्डवत प्रणाम कर तथा विनम्र भाव से प्रश्न कर, तब वे तत्वदृष्टा संत आपको परमेश्वर का तत्व ज्ञान बताएंग...

Come know Jainism

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#जैन_धर्म की जानकारी #ऋषभदेव जी अयोध्या के राजा नाभिराज के पुत्र थे। धार्मिक विचारों के राजा थे। उनके कुल गुरु जो ऋषिजन थे, उनसे परमात्मा प्राप्ति का मार्ग जानना चाहा। उन्होंने ओम नाम तथा #हठयोग करके तप करने की विधि दृढ़ कर दी। राजा ऋषभदेव को परमात्मा प्राप्ति करने तथा जन्म-मरण के दुखद चक्र से छूटने के लिए #वैराग्य धारण करने की ठानी। अपने पुत्रों को राज्य बांटकर घर त्याग कर जंगल में चले गये। पहले 1 वर्ष तक #निराहार रहे। फिर 1000 वर्ष तक हठ योग तप किया। उसके पश्चात् धर्मदेशना (दीक्षा) देने लगे। पहली #धर्मदेशना अपने पोते मारीचि(भरत पुत्र) को दी फिर वही मारीचि वाला जीव आगे चलकर चौबीसवें तीर्थंकर #महावीर जैन बना। ऋषभदेव जी प्रभु के वैराग में मस्त रहते थे। वे #निवस्त्र रहने लगे क्योंकि उनको अपनी स्थिति का ज्ञान नहीं था वह परमात्मा के वैराग्य में इतने मस्त थे कि उनको ध्यान नहीं था कि वह #नंगे है। उनका ध्यान परमात्मा में रहता था। वर्तमान के जैनी महात्माओं ने वह नकल कर ली और नंगे रहने लगे। यह मात्र #परंपरा का निर्वाह है। ऋषभ देव जी अपने मुख में #पत्थर का टुकड़ा लेकर नग्न अवस्था में...

Holy bible

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धार्मिक समूह में कई विश्वासियों का मानना है कि: "परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में दर्ज हैं। बाइबल से अलग परमेश्वर के कोई वचन और कार्य नहीं हैं।" क्या ये कहना तथ्यों के अनुरूप है? क्या आपलोग यकीन से कहते हैं कि व्यवस्था के युग में यहोवा द्वारा किया गया हर एक कार्य सम्पूर्ण रूप से बाइबल में दर्ज है? क्या आपलोग वचन दे सकते हैं कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के सभी वचन और कार्य सम्पूर्ण रूप से बाइबल में दर्ज हैं? अगर ये नज़रिया तथ्यों के अनुसार न हो तो नतीजा क्या होगा? क्या यह परमेश्वर को लोगों की नज़र में नीचा नहीं दिखायेगा, उन्हें सीमित और उनकी निंदा नहीं करेगा? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित नहीं करता है? हमें पता होना चाहिये कि परमेश्वर ने जब अपने कार्य का हर चरण पूरा कर लिया, तो उसके सालों बाद बाइबल का संकलन उन लोगों ने किया जो परमेश्वर की सेवा करते थे। यकीनी तौर पर उसके कुछ अंश या तो गुम हो गये या हटा दिये गये। ये एक वास्तविकता है। पैगम्बरों के कुछ वचन हैं जो पुराने विधान में दर्ज नहीं हैं, लेकिन उन्हें प्राचीन बाइबल में शामिल किया गया है। नए विधान के, चार सुसम...

Lack of education

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वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली की समस्याएँ संदर्भ हाल के दशकों में देश के आर्थिक, सामाजिक व अन्य क्षेत्रों में ढाँचागत एवं नीतिगत स्तर पर काफी प्रगति हुई है। फलस्वरुप देश की विकास दर तेज़ी से बढ़ी है। इस बढ़ती विकास दर ने अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधारों को गति प्रदान की है, लेकिन इन परिवर्तनों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं को दूर नहीं किया है। प्रस्तुत लेख में हम वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की विश्व में स्थिति, विद्यमान समस्याओं एवं संभावित समाधानों की चर्चा करेंगे। हाल के वैश्विक अध्ययन न्यूयॉर्क के ‘पी.ई.यू. रिसर्च सेंटर’ (Pew Research Center) द्वारा विश्व के 90 से अधिक देशों में स्कूली शिक्षा मानकों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन 'विश्व में धर्म एवं शिक्षा' नाम से किया गया| यह दुनिया के प्रमुख धर्मों के बीच "शैक्षिक प्राप्ति" (Educational Attainment) पर केंद्रित है। इसमें हिंदुओं में "शैक्षिक प्राप्ति" का स्तर सबसे कम पाया गया और भारतीय विद्यालयी शैक्षणिक व्यवस्था को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे निम्न स्थान प्रदान ...